Monday, September 24, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ
 
जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”

24 – पंचशील

बंधन –मां जतका हवयँ, सबला मुक्त कराव
पंचशील ला मान के ,  विश्व-शांति अब लाव
विश्व-शांति अब लाव , सबो के भला विचारो
अस्त्र-शस्त्र,बम वम  सब ला सागर मां डारो
आ जावय बंधुत्व-भाव, जन-जन के मन मां
रहे   पावे  अब  कोन्हों , मनखे  बंधन मां.


[ पंचशील – जितने भी बंधन में(बंधक) हैं, उन सबको मुक्त करायें. पंचशील को मानें और विश्व में शांति लायें. सबके कल्याण के लिये विचार करें. अस्त्र-शस्त्र,बम इत्यादि को सागर में डाल दें. जन-जन के मन में बंधुत्व-भाव आ जाये. अब कोई भी मनुष्य किसी के बंधन में नहीं रह पाये ]

4 comments:

  1. आदरणीय स्व. कोदूराम दलित जी को सादर नमन
    उनकी रचनाओं में समाज सुधार जन कल्याण के भाव समाहित रहते है
    बहुत ही बढ़िया दोहे हैं
    अरुण जी आभार आपने इतनी सार्थक रचना से हमें रूबरू कराया

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  2. बहुत ही सुन्दरता से व्यक्त पंचशील के सिद्धान्त..

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  3. पंचशील के समय की कुंडली |
    आज के सन्दर्भ में भी सटीक ||
    आभार अरुण भाई जी -

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