क्यों भेजा था बाबुल तूने
दुनियाँ के गलियारों में ?
कैसे खुद की रक्षा करती
इन मदमस्त बहारों में ?
जान के बेटी ,मेरे संग क्यों
सौतेला व्यवहार किया
क्यों ना समझूँ औरों जैसा
तूने भी व्यापार किया.
बेटा होता ,यदि मैं
करता तू परवाह हजारों में...........
सबकी आँखें गड़ी हुई थी
मेरी यौवन गगरी में
कब तक खुद को बाँध मैं पाती
संस्कार की गठरी में.
गठरी खुली,भ्रमित हो गई मैं
प्रियतम की मनुहारों में..........
कोरी चुनरिया ओढ़ के आई
थी, मैं तेरे इस जग में
राह में फिसलन ही फिसलन थी
फिसल गई मैं,जगमग में.
अब मुझ पर आरोप लगाता
बाबुल ! क्यों दरबारों में..............
अब तो अपने पास बुला ले
मैं तेरी ही जायी हूँ
भूल के भी मत कहना बाबुल !
बेटी एक परायी हूँ.
अग्नि-परीक्षा ले के देख
मैं पली-बढ़ी अंगारों में.................
-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)