सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या ?
पूरने वाली न हो तो
द्वार पर फिर अल्पना क्या ?
लक्ष्मी जब ना रही
कैसे मनाओगे दीवाली ?
सोचिये बिन अन्नपूर्णा
सज सकेगी कैसे थाली ?
ना रही देवी अगर तो
देवता की अर्चना क्या ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या ?
पुत्र ही बस पुत्र होंगे
पुत्र –वधु आयेगी कैसे ?
वंश-वृद्धि की लता
आंगन में लहरायेगी कैसे ?
जब नहीं किलकारियाँ फिर
हर्ष क्या और वेदना क्या ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या ?
तुम यदि बेटे औ बेटी में
जरा भी फर्क दोगे
पूर्वजों के पास जब
जाओगे तो क्या तर्क दोगे ?
छोड़ दो संहार , समझो
बेटियों बिन सर्जना क्या ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या ?
रचनाकार - अरुण कुमार निगम
प्रस्तुतकर्ता -
रचनाकार - अरुण कुमार निगम
प्रस्तुतकर्ता -
श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़.