सियानी गोठ


जनकवि कोदूराम “दलित”
19.गोड़
पूजे जाथे गोड़ हर , मुँड़ नहिं पूजे जाय
सबो अंग ले जास्ती , गोड़ काम के आय
गोड़ काम के आय, गोड़ ले निकलिस गंगा
सहिथें गजब कलेश , जउन मन रथें अपंगा
पावन चरणामृत पीये बर सब झिन पाथे
गोड़ देउँता अउ गुरु-जन के पूजे जाथे.
[ गोड़ = पैर, चरण : पैर पूजे जाते हैं, सिर नहीं पूजा जाता. सभी
अंगों से अधिक पैर काम के हैं. पैरों से ही गंगा निकली है. अपंग, अपाहिग को अत्यंत
ही क्लेश सहना पड़ता है. पावन चरणामृत पीने के लिये लोग प्राप्त करते हैं, देवता और
गुरुजन के पैर पूजे जाते हैं ]