Wednesday, April 18, 2012

सियानी गोठ

सियानी गोठ 

 
जनकवि कोदूराम “दलित”
3.चतुरा टूरा

भाई, तुम चतुरा बनो, पढ़ो-लिखो दिन–रात
लंद – फंद ला छोड़ के  ,  मानो गुरु के बात
मानो  गुरु के बात, चरित ला अपन सुधारो
दरपन  साहीं मन ला, अपन उजर कर डारो
अच्छा  लइका  बनो , सबो  के करो  भलाई
गुरु गुड़ रहि जाही, शक्कर तुम बनहू भाई.

[चतुर बालक या लड़का – भाई ! तुम चतुर बनो, दिन रात पढ़ो-लिखो. लंद-फंद को छोड़ कर गुरु की बात मानो. अपने चरित्र को सुधार कर अपने मन को दर्पण की भाँति उज्जवल कर डालो. अच्छे बच्चे बन कर सभी की भलाई करो. गुरु गुड़ रह जायेंगे और तुम शक्कर बन जाओगे.]

Monday, April 16, 2012

सियानी गोठ


सियानी गोठ
 
जनकवि कोदूराम"दलित"
  
गुरु

गुरु हरथे अज्ञान ला, गुरु करथे कल्यान
गुरु के आदर नित करो,गुरु हर आय महान
गुरु हर आय महान, दान विद्या के देथे
माता-पिता समान, शिष्य ला अपना लेथे
मानो गुरु के बात, भलाई गुरु हर करथे
खूब सिखो के ज्ञान, बुराई गुरु हर हरथे.
-         जनकवि कोदूराम “दलित”

[ गुरु अज्ञान हरते हैं, गुरु कल्याण करते हैं. गुरु का नित्य आदर करें क्योंकि गुरु महान हैं. ये विद्या का दान देते हैं. माता –पिता के समान ही शिष्य को अपना लेते हैं. गुरु की बात मानें. गुरु ही भलाई करते हैं. ये खूब ज्ञानसिखा कर बुराई का हरण करते हैं.]

Saturday, April 14, 2012


  सियानी गोठ   
                        
जनकवि कोदूराम"दलित"
छत्तीसगढ़ के जनकवि स्व.कोदूराम”दलित” के जीवन काल में प्रकाशित पुस्तक “सियानी गोठ” में छिहत्तर कुण्डलिया संग्रहित हैं.यह पुस्तक 12 मई 1967 में प्रकाशित हुई थी. छत्तीसगढ़ी में सियान का अर्थ होता है बड़े बुजुर्ग या ज्ञानी  और गोठ का अर्थ है बात या सीख.  “सियानी गोठ” की कुण्डलिया हर युग में प्रासंगिक  रहेंगी. जन-हित खातिर प्रकाशित “सियानी गोठ” की कुण्डलिया का प्रकाशन एक श्रृंखलाकेरूपमें प्रारम्भ किया जा रहा है. आशा है आप अवश्य ही पसंद करेंगे
   अरुण कुमार निगम
मोर परिचय
लइका पढ़ई के सुघर, करत हववँ मैं काम
कोदूराम दलितहवय, मोर गँवइहा नाम
मोर  गँवइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया !
जन-हित खातिर गढ़े हववँ मैं ये कुण्डलिया
शँउक मु हूँ-ला घलो हवय कविता गढ़ई के
करथवँ काम दुरुग –मां मैं लइका पढ़ई के.

पुस्तक के मुख पृष्ठ पर प्रकाशित कवि का परिचय
मेरा परिचय – मैं बच्चों को पढ़ाने का सुंदर काम करता हूँ. मेरा नाम कोदूराम दलित’(ग्रामीण परिवेश का नाम) है, इस नाम को भाइयों भुला नहीं देना.जन हित खातिर मैंने ये कुण्डलिया गढ़ी हैं, मुझे भी कविता गढ़ने का शौक है, मैं दुर्ग शहर में बच्चों को पढ़ाने का कार्य करता हूँ

सुमिरन
सुमिरन करिहौं नाम ला, सदा तोर भगवान
मनखे चोला रतन-जस, देये हस तैं दान
देये हस तैं दान, करे हस किरपा भारी
तहीं आस गुरु, बंधु, मितान ,बाप ,महतारी
करिहौं सदा सुकरम, दुस्करम ला मैं डरिहौं
देबे मोला तार, तोर नित सुमिरन करिहौं.
{ स्मरण -हे भगवान ! मैं सदा तुम्हारे नाम का स्मरण करूंगा, तुमने रत्न जैसा कीमती मानव शरीर दान में देकर मुझ पर अपार कृपा की है. तुम ही मेरे गुरु, भाई, मित्र तथा माता पिता हो. मैं दुष्कर्मों से बचकर सदा सुकर्म करूंगा. मुझे तार देना ( मुक्ति देना ), नित्य तुम्हारा स्मरण करूंगा.}

Thursday, March 22, 2012

विश्व जल दिवस पर....




गोल गोल रानी   ,  इत्ता इत्ता पानी
कविता ये सुहानी , बचपन की निशानी
गा गा के सुनाती थी सबकी दादी नानी
गोल गोल रानी   ,  इत्ता इत्ता पानी

मोती मानस चून के   वास्ते हो पानी
किसने सुनी नहीं  रहिमन की जुबानी
सोचें , क्या ये सिर्फ है कविता पुरानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इत्ता पानी.

थोड़ी सी नादानी   ,  लायेगी वीरानी
आयेगी कहाँ से फिर मौजों की रवानी
कहीं मिट जाये नहीं,जीवन की निशानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इता पानी.

विश्व जल दिवस पर मन में है ठानी
जल संरक्षण करेंगे, पीयेंगे शुद्ध पानी
कारण  तलाशें कैसे  गोल हुआ पानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इता पानी.

श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Wednesday, March 7, 2012

होली की फाग .....



रंग बगरे हे बिरिज धाम मा
कान्हा  खेले रे होली 
वृन्दावन ले आये हवे 
गोपी  ग्वाल के टोली 
कनिहा में खोचे बंसी 
मोर मुकुट लगाये 
यही यशोदा मैया के 
किशन कन्हैया आए
आघू आघू कान्हा रेंगे 
पाछू  ग्वाल गोपाल 
हाथ में धरे पिचकारी 
फेके रंग गुलाल 
रंग बगरे हे …………….
दूध दही के मटकी मा 
घोरे रहे भांग
बिरिया पान सजाये के 
खोचे रहे लवांग
ढोल नंगाडा बाजे रे 
फागुन के मस्ती
होगे रंगा-रंग सबो 
गाँव गली बस्ती 
 रंग बगरे हे ……
गोपी ग्वाल सब नाचे रे 
गावन लगे फाग 
जोरा जोरी मच जाहे 
कहूँ डगर तैं भाग 
ग्वाल बाल के धींगा मस्ती 
होली के हुड्दंग 
धानी चुनरी राधा के 
होगे रे बदरंग 
 रंग बगरे हे …….
करिया बिलवा कान्हा के 
गाल रंगे हे लाल 
गली गली माँ धुमय वो 
मचाये हवे धमाल
रास्ता छेके कान्हा रे 
रंग गुलाल लगाये 
एती ओती भागे राधा 
कइसन ले बचाए 
रंग बगरे हे  …….
आबे आबे कान्हा तयं  
मोर अंगना दुवारी 
फागुन के महिना मा 
होली खेले के दारी
छत्तीसगढ़िया मनखे हमन 
यही हमार चिन्हारी 
तोर संग होली खेले के 
आज हमार हे बारी
रंग बगरे हे …….

श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग

Sunday, March 4, 2012

जनकवि स्व.कोदूराम दलित की १०२ वीं जयंती पर विशेष...


5 मार्च २०१२ को जनकवि स्व.कोदूराम दलित की १०२ वीं जयंती है. इस  अवसर पर उनकी कुण्डलिया .......

                    (1) नाम

रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार
अत: सभी का कर भला, है इसमे ही सार
है इसमें  ही सार, यार,  तू  तज के  स्वारथ 
अमर  रहेगा  नाम, किया  कर नित  परमारथ
काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किन्तु  सुनाम  सदा दुनिया में रह जाना है.

                  (२) छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चांउर दार
हवयं लोग मन इहाँ के, सिधवा अउर उदार
सिधवा अउर उदार हवयं, दिन रात कमावयं 
दे दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयं
ठगथयं ये बपुरा मन ला बंचक  मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक ,  इही कारन छत्तीसगढ़.