सियानी गोठ
जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”
26 - राख
नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय
परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय
गजब अन्न उपजाय , राख मां फूँको-झारो
राखे-मां कपड़ा – बरतन उज्जर कर
डारो
राख चुपरथे तन –मां, साधु,संत, जोगी मन
राख दवाई आय , राख –ला नष्ट करो झन.
[ राख – राख को नष्ट ना
करें ,यह बहुत ही उपयोगी है.
राख जब खेत में डाली जाती है तो अन्न का उत्पादन बढ़ाती है.राख से ही झाड़-फूँक की जाती
है. राख से ही कपड़ेऔर बर्तन उजले होते हैं. साधु,संत और योगी अपने तन
पर राख चुपड़ते(लगाते/मलते) हैं.राख दवा भी है, राख को नष्ट ना करें.]