Thursday, March 22, 2012

विश्व जल दिवस पर....




गोल गोल रानी   ,  इत्ता इत्ता पानी
कविता ये सुहानी , बचपन की निशानी
गा गा के सुनाती थी सबकी दादी नानी
गोल गोल रानी   ,  इत्ता इत्ता पानी

मोती मानस चून के   वास्ते हो पानी
किसने सुनी नहीं  रहिमन की जुबानी
सोचें , क्या ये सिर्फ है कविता पुरानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इत्ता पानी.

थोड़ी सी नादानी   ,  लायेगी वीरानी
आयेगी कहाँ से फिर मौजों की रवानी
कहीं मिट जाये नहीं,जीवन की निशानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इता पानी.

विश्व जल दिवस पर मन में है ठानी
जल संरक्षण करेंगे, पीयेंगे शुद्ध पानी
कारण  तलाशें कैसे  गोल हुआ पानी
गोल गोल रानी  ,  इत्ता इता पानी.

श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Wednesday, March 7, 2012

होली की फाग .....


रंग बगरे हे बिरिज धाम मा
कान्हा  खेले रे होली 
वृन्दावन ले आये हवे 
गोपी  ग्वाल के टोली 
कनिहा में खोचे बंसी 
मोर मुकुट लगाये 
यही यशोदा मैया के 
किशन कन्हैया आए
आघू आघू कान्हा रेंगे 
पाछू  ग्वाल गोपाल 
हाथ में धरे पिचकारी 
फेके रंग गुलाल 
रंग बगरे हे …………….
दूध दही के मटकी मा 
घोरे रहे भांग
बिरिया पान सजाये के 
खोचे रहे लवांग
ढोल नंगाडा बाजे रे 
फागुन के मस्ती
होगे रंगा-रंग सबो 
गाँव गली बस्ती 
 रंग बगरे हे ……
गोपी ग्वाल सब नाचे रे 
गावन लगे फाग 
जोरा जोरी मच जाहे 
कहूँ डगर तैं भाग 
ग्वाल बाल के धींगा मस्ती 
होली के हुड्दंग 
धानी चुनरी राधा के 
होगे रे बदरंग 
 रंग बगरे हे …….
करिया बिलवा कान्हा के 
गाल रंगे हे लाल 
गली गली माँ धुमय वो 
मचाये हवे धमाल
रास्ता छेके कान्हा रे 
रंग गुलाल लगाये 
एती ओती भागे राधा 
कइसन ले बचाए 
रंग बगरे हे  …….
आबे आबे कान्हा तयं  
मोर अंगना दुवारी 
फागुन के महिना मा 
होली खेले के दारी
छत्तीसगढ़िया मनखे हमन 
यही हमार चिन्हारी 
तोर संग होली खेले के 
आज हमार हे बारी
रंग बगरे हे …….

श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग

Sunday, March 4, 2012

जनकवि स्व.कोदूराम दलित की १०२ वीं जयंती पर विशेष...


5 मार्च २०१२ को जनकवि स्व.कोदूराम दलित की १०२ वीं जयंती है. इस  अवसर पर उनकी कुण्डलिया .......

                    (1) नाम

रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार
अत: सभी का कर भला, है इसमे ही सार
है इसमें  ही सार, यार,  तू  तज के  स्वारथ 
अमर  रहेगा  नाम, किया  कर नित  परमारथ
काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किन्तु  सुनाम  सदा दुनिया में रह जाना है.

                  (२) छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चांउर दार
हवयं लोग मन इहाँ के, सिधवा अउर उदार
सिधवा अउर उदार हवयं, दिन रात कमावयं 
दे दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयं
ठगथयं ये बपुरा मन ला बंचक  मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक ,  इही कारन छत्तीसगढ़.