Monday, September 19, 2011

बेटी बचाओ अभियान :


सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या  ?
पूरने वाली न हो तो
द्वार पर फिर अल्पना क्या  ?

लक्ष्मी जब ना रही
कैसे मनाओगे दीवाली  ?
सोचिये बिन अन्नपूर्णा
सज सकेगी कैसे थाली  ?

ना रही देवी अगर तो
देवता की अर्चना क्या  ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या  ?

पुत्र ही बस पुत्र होंगे
पुत्र –वधु आयेगी  कैसे  ?
वंश-वृद्धि की लता
आंगन में लहरायेगी कैसे  ?

जब नहीं किलकारियाँ फिर
हर्ष क्या और वेदना क्या  ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या  ?

तुम यदि बेटे औ बेटी में
जरा भी फर्क दोगे
पूर्वजों के पास जब
जाओगे तो क्या तर्क दोगे  ?

छोड़ दो संहार , समझो
बेटियों बिन सर्जना क्या  ?
सृष्टि ही जब नष्ट होगी
सृजन की फिर कल्पना क्या  ?

रचनाकार - अरुण कुमार निगम 

प्रस्तुतकर्ता - 

श्रीमती सपना निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़.

25 comments:

  1. सार्थक सन्देश देती बहुत सुन्दर रचना ....

    कुछ ऐसे ही भाव यहाँ भी हैं ---

    रचयिता सृष्टि की

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  2. सार्थक और सामयिक अभिव्यक्ति।

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  3. सुन्दर संदेश देती सार्थक अभिव्यक्ति।

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  4. बहुत सही चिंतन किया है आपने काव्य के माध्यम से। लोग कुछ तो सीख लें, जो इस कुकर्म को अपना कर कन्या-भ्रूण हत्या कर रहे हैं।

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  5. आपके ब्लॉग को यहां जोड़ा है
    1 ब्लॉग सबका
    कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

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  6. बहुत अच्छी कविता. सुंदर प्रस्तुतिकरण . बधाई और आभार.

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  7. आपकी चिंता का कारण सही है मगर यह नासमझ समाज , विचारणीय पोस्ट , ऑंखें खोलने में सक्षम आपका आभार

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  8. vandana ji ki baat se sahamt hoon sundar evam saarthak sandesh deti badhiyaa kavitaa ....

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  9. संदेशपरक रचना. ....

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  10. प्रेरक संदेश देने वाली रचना।

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  11. भ्रूण हत्या पर बेहतरीन रचना.

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  12. बहुत सार्थक और मर्म स्पर्शी रचना...बधाई स्वीकार करें

    नीरज

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  13. पुत्र ही बस पुत्र होंगे
    पुत्र –वधु आयेगी कैसे ?
    वंश-वृद्धि की लता
    आंगन में लहरायेगी कैसे ?sambhlo, socho , jaago

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  14. वाह! प्रेरक संदेश देने वाली रचना।

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  15. किन्तु आज - कल माहौल चाहे जो हो - का है ! ये बाते पुराणी हो चली है ! एक्का - दुक्का ही बची है ! फिर भी लय - माय और जागरुक करती कविता !

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  16. किन्तु आज - कल माहौल चाहे जो हो - का है ! ये बाते पुराणी हो चली है ! एक्का - दुक्का ही बची है ! फिर भी लय - माय और जागरुक करती कविता !

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  17. बेहतरीन रचना.. सुन्दर अभिव्यक्ति....
    आपको सपरिवार नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं

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  18. कल राज एक्सप्रेस जबलपुर एडिशन अवश्य देखिये आपका यह आलेख के साथ चुनी गया है..्बेहद प्रभावी एवम साहित्यिक दृष्टि से दोष हीन हीन भी है बधाईयां

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  19. बहुत ही मार्मिक एवं हृदय स्पर्शी रचना है सपना जी की .
    हमारी बधाई उन तक प्रेषित करने का कष्ट करें.
    - विजय तिवारी 'किसलय'

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  20. बहुत ही सुन्दर रचना है । सचमुच बेटी घर ही नही बाहर और पूरी दुनिया की रौनक होती है ।

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