सियानी गोठ
जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”
24 – पंचशील
बंधन –मां जतका हवयँ, सबला मुक्त कराव
पंचशील ला मान के , विश्व-शांति अब लाव
विश्व-शांति अब लाव , सबो के भला विचारो
अस्त्र-शस्त्र,बम वम सब
ला सागर मां डारो
आ जावय बंधुत्व-भाव, जन-जन के मन मां
रहे न पावे अब
कोन्हों , मनखे बंधन मां.
[ पंचशील – जितने भी बंधन
में(बंधक) हैं, उन सबको मुक्त करायें. पंचशील को मानें और विश्व में शांति लायें. सबके
कल्याण के लिये विचार करें. अस्त्र-शस्त्र,बम इत्यादि को सागर में डाल दें. जन-जन के
मन में बंधुत्व-भाव आ जाये. अब कोई भी मनुष्य किसी के बंधन में नहीं रह पाये ]