Friday, September 21, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ
 
जनकवि स्व. कोदूराम “दलित”

23. अणु

अणु ला नान्हें समझ मत, अणु ला तुच्छ न जान
अणु मा शक्ति  अघात हे  ,   अणु मन आयँ महान
अणु मन आयँ महान,बनिस अणु-अणु मां भुइयाँ
अणु मन आयँ  विनाशक  अउ निरमाण करइया
अणु  के  असल  मरम - ला  अणु  रखइया  जाने
करो सृजन अणु मां , समझो मत अणु ला नान्हें.

[ अणु को छोटा मत समझें, इसे तुच्छ भी नहीं जानें. अणु में अपार शक्ति होती है. अणु महान होता है. अणुओं के मेल से ही यह धरती बनी है. अणु विनाशक है तो निर्माणकर्ता भी है. अणु का असली मर्म तो अणु के रक्षक ही जानते हैं. अणु का प्रयोग सृजन के लिये करें.]

Thursday, September 20, 2012

सियानी गोठ


  सियानी गोठ
 
जनकवि स्व.कोदूराम “दलित”

23 .टेटका

मुँड़ी   हलावय   टेटका  ,  अपन   टेटकी   संग
जइसन देखय समय ला, तइसन बदलिन रंग
तइसन   बदलिन   रंग , बचाय अपन वो चोला
लिलय  गटागट जतका ,  किरवा पाय सबोला
भरय  पेट  तब   पान - पतेरा - मां  छिप  जावय
ककरो   जावय   जीव  , टेटका  मुड़ी  हलावय.

[ टेटका = गिरगिट (अवसरवादी) : गिरगिट अपनी मादा गिरगिट के संग सिर को हिलाता रहता है. जैसे समय को देखता है ,वैसा ही रंग बदलता है. समयानुसार रंग को बदल कर वह अपने आप को बचा लेता है. जितने भी कीड़े मिलते हैं उन सब को गटागट निगलता जाता है. जब पेट भर जाता है तब पत्तों में छिप जाता है. चाहे किसी के प्राण जाये, गिरगिट अपने सिर को हिलाता रहता है.]

Wednesday, August 15, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ
 
जनकवि स्व. कोदूराम “दलित

22..वीर सिपाही

वीर सिपाही फउज के, तुम सब झिन बन जाव
बइरी  मन   जायँ  तो   ,     तुरते मार भगाव
तुरते  मार  भगाव   ,   खूब  गरजो - ललकारो
आयँ सपड़ –मां उन्हला , पटक-पटक के मारो
विजय तुम्हर होही  तुम्हला सब झिन सँहराहीं
नाम  कमाओ   , बनो    फउज के  वीर सिपाही.

[तुम सब फौज के वीर सिपाही बन जाओ.यदि दुश्मन आ जायें तो उन्हें तुरंत मार-भगाओ.खूब गरजो और ललकारो.यदि पकड़ में आ जायें तो उन्हें मार डालो.तुम्हारी विजय होगी, तुम्हें सभी सहरायेंगे.फौज के वीर सिपाही बनकर नाम कमाओ.]

Sunday, August 12, 2012

सियानी गोठ


सियानी गोठ 
जनकवि कोदूराम “दलित”

15. बम

बौराइन बमबाज मन  ,  बम  ला करयँ तयार
बमबाजी कर निठुर मन ,  करथयँ नर-संहार
करथयँ नर-संहार, गिरायथयँ बम प्रयलंकर
बम –ला नष्ट करो -  हे बमलाई ! बम शंकर !!
बम –मां हवा, बिगाड़िन, विकट रोग फैलाइन
चौपट  करे  लगिन , बमबाज मनन बौराइन.

[ बमबाज लोग बौरा कर बम बम का निर्माण करते हैं. ये निष्ठुर लोग बमबाजी करके नर-संहार करते हैं. प्रलयंकारी बम गिराते हैं. हे बमलेश्वरी माँ ! हे बम शंकर ! बम को नष्ट कीजिये. बमबाजों  ने हवा को प्रदूषित किया है, कई असाध्य रोग फैलाये हैं और सब कुछ चौपट कर डाला है .]

Tuesday, May 15, 2012

सियानी गोठ


सियानी गोठ  
 
जनकवि कोदूराम “दलित”

20.विज्ञान

आइस   जुग  विज्ञान के , सीखो  सब  विज्ञान
सुग्घर आविस्कार कर ,  करो जगत कल्यान
करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो
तुम्हू  जियो  अउ दूसर  मन ला घलो जियन दो
ऋषि मन के  विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस
सीखो सब  विज्ञान  ,    येकरे जुग अब आइस.

[विज्ञान :  विज्ञान का युग आया, सब विज्ञान सीखें. अच्छे आविष्कार कर के जगत का कल्याण करें. सब लोगों का आशीष प्राप्त करें. आप भी जीयें और दूसरों को भी जीने दें. ऋषियों ने विज्ञान के प्रयोग से सब को सुखी बनाया. विज्ञान का युग आया, सब विज्ञान सीखें.]

Monday, May 14, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ
जनकवि कोदूराम “दलित”

19.गोड़

पूजे  जाथे  गोड़  हर  ,  मुँड़  नहिं   पूजे   जाय
सबो  अंग   ले  जास्ती   , गोड़  काम के आय
गोड़  काम के आय, गोड़ ले निकलिस गंगा
सहिथें  गजब कलेश  , जउन मन रथें अपंगा
पावन  चरणामृत   पीये   बर  सब झिन  पाथे
गोड़  देउँता   अउ   गुरु-जन  के   पूजे   जाथे.

[ गोड़ = पैर, चरण  : पैर पूजे जाते हैं, सिर नहीं पूजा जाता. सभी अंगों से अधिक पैर काम के हैं. पैरों से ही गंगा निकली है. अपंग, अपाहिग को अत्यंत ही क्लेश सहना पड़ता है. पावन चरणामृत पीने के लिये लोग प्राप्त करते हैं, देवता और गुरुजन के पैर पूजे जाते हैं ]

Thursday, May 10, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ 
जनकवि कोदूराम “दलित”

18.कतरनी

काटय - छाँटय  कतरनी, सूजी  सीयत  जाय
सहय  अनादर  कतरनी , सूजी  आदर  पाय
सूजी  आदर पाय ,  रखय  दरजी  पगड़ी मां
अउर  कतरनी  ला चपकय  वो गोड़ तरी-मां
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयँ करनी
सूजी   सीयय, काटत - छाँटत  जाय कतरनी.

[ कैंची  : कतरनी याने कैंची काटते – छाँटते जाती है. सुई सीते जाती है. कैंची को अनादर मिलता है. सुई सम्मान पाती है. दर्जी सुई को अपनी पगड़ी में खोंच कर रखता है और कैंची को अपने पैरों तले दबा कर रखता है. जो जैसी करनी करता है, उसे वैसे ही फल प्राप्त होते हैं. कतरनी काटने-छाँटने का कार्य करती है और सुई सीने का.]

भावार्थ : किये गये कर्म के अनुरूप ही फल प्राप्त होते हैं. जिस प्रकार सुई सीने का कार्य करती है अर्थात जोड़ने का कार्य करती है तो दर्जी उसे अपनी पगड़ी में स्थान देकर सम्मानित करता है. वहीं कतरनी काटती छाँटती है अर्थात अलगाव उत्पन्न करती है. दर्जी कैंची को अपने पैरों तले स्थान देता है. अत: सबको परस्पर जोड़ने का कार्य करें व सम्मान पायें.