Monday, April 23, 2012

सियानी गोठ

सियानी गोठ 
 
 
जनकवि कोदूराम “दलित”

6.    कपूत

दाई  -  ददा   रहयँ   तभो  , मेंछा  ला  मुड़वायँ
लायँ  पठौनी अउर उन  डउकी के बन जायँ
डउकी  के  बन  जायँ  , ददा - दाई  नइ भावयँ
छोड़-छाँड़ के उन्हला, अलग पकावयँ-खावयँ
धरम  -  करम सब भूल जायँ भकला मन भाई
बनयँ  ददा  -  दाई   बर   ये    कपूत   दुखदाई.


[कपूत - माता-पिता के जीवित रहते हुये, मूँछ मुंडवाते हैं. ब्याह कर पत्नी लाते हैं और उसी के होकर रह जाते हैं. फिर उन्हें माता-पिता नहीं भाते . माता- पिता को छोड़ कर अलग से पकाते और खाते हैं. ये मूर्ख धर्म-कर्म सब भूल जाते हैं. ऐसे कपूत माता-पिता के लिये दुखदाई होते हैं]

5 comments:

  1. सटीक ... सुंदर रचना पढ़वाने के लिए आभार

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  2. बड़ा प्रायोगिक उदाहरण..

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बुधवारीय चर्चा-मंच
    पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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