Friday, April 27, 2012

सियानी गोठ


 सियानी गोठ 
 

जनकवि कोदूराम “दलित”

9.    गाय

लछमी साहीं समझ के, पालो घर-घर गाय
चारा खावय अपन हर, तुम्हला दूध पियाय
तुम्हला दूध पियाय , खाद बर देवय गोबर
खींचे नाँगर अउ गाड़ी  , बइला  मन येकर
करथे  अड़बड  - ये बपुरी हर तुम्हर भलाई
पालो घर-घर गाय, समझ के लछमी साहीं.

[ गाय – लक्ष्मी की तरह समझ कर  घर-घर में गाय पालें. यह स्वयं चारा खाती है और तुम्हें दूध पिलाती है. खाद के लिये गोबर देती है. इसके बैल हल और गाड़ी खींचते हैं. गाय बेचारी तुम्हारी बहुत भलाई करती है. अत:
लक्ष्मी की तरह समझ कर  घर-घर में गाय पालें.]

5 comments:

  1. बहुत सुंदर ... आज कल घर ही इस लायक नहीं हैं कि गाय पाली जा सके ...

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  2. गोमाता पर
    बढ़िया कुंडली ।
    आभार ।

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  3. गाय की महत्ता, बड़े ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है..

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  4. वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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